Ziri - 1 in Hindi Moral Stories by प्रियंका गुप्ता books and stories PDF | झिरी - 1

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झिरी - 1

झिरी

प्रियंका गुप्ता

भाग -

चाँद किसी बदमाश बच्चे सा पेड़ की फुनगी पर जा टँगा था...गोल मटोल से चेहरे पर शरारती मुस्कान लिए हुए...जैसे अभी अभी लाद-फाँद कर कमरे में फेंक से दिए गए बंटी बाबू की हालत का पूरा मज़ा लेने, खिड़की से ताँक-झाँक करने के पूरे मूड में हो। बंटी बाबू यानि कि समीर बाबू...नए-नवेले दूल्हे मियाँ, जिन्हें बड़े इंतज़ार के बाद अब जाकर इजाज़त दी गई है अपनी प्यारी सी नई-नवेली दुल्हन के करीब आने की...। वैसे जब रिश्ते की भाभियाँ धकेलती-छेड़ती उसे कमरे की ओर ला रही तो दिखा तो ऐसे ही रहा था जैसे उसे कोई जल्दी हो ही न...। पर भाभियाँ कौन सी कम थी। सबसे ज्यादा तो वो दीपू भैया वाली शान्ति भाभी...। बस्स, नाम की ही शान्ति हैं, वरना तौबा...जो एक बार चढ़ जाए उनके हत्थे...उसका तो ख़ुदा मालिक...। आज तो जैसे बंटी की घंटी बजाने की कमर कस ली थी उन्होंने...। शर्म-लिहाज तो उनमें जैसे है ही नहीं...। भगवान जाने, दीपू भैया कैसे झेलते हैं उन्हें...।

रिसेप्शन अभी ही तो ख़त्म हुआ था और उन्होंने उसे कपड़े बदलने का मौका भी नहीं दिया था,"आय हाय लल्ला जी, कौन सा हमारी देवरानी तुम्हारे कपड़े देखेगी...? जो देखना-दिखाना होगा...उसका ही तो मौका दे रहे हैं हम...और एक तुम हो...अहसान मानने की कौन कहे, उल्टे हमीं पर धौंस जमा रहे...।"

"तुम भी न...हद हो भाभी...।" खिसियानी हँसी हँस कर उसने दूर से मज़ा ले रहे दीपू भैया की ओर देखा तो भाभी ने उसका मुँह पकड़ अपनी ओर घुमा लिया था,"उधर क्या देख रहे हो...? अपने भोले-भंडारी भैया की जगह हमें अपना गुरू माने होते तो बहुते मज़े करते...। अब जाओ, देखे कौन सा तीर मार कर आते हो...।"

उसे कुछ जवाब नहीं सूझा, पर दीपू भैया को सामने आते देख उसे राहत लगी। अब शायद ये ही मोर्चा सम्हाल लें...कब से उसे ‘गोल्डन नाइट’ के विभिन्न गुर सिखाए जा रहे थे। पर दीपू भैया तो जैसे टीम ही बदल लिए,"अरे, तुम गुरू बन के का कर लेती...? कल रात भर तो ये जनाब खुन्नस में हमको जितनी लातें मारें हैं न, भगवान करे...जीवन भर बिस्तर पर उससे ज्यादा लात खाएँ...। अब बताओ भला, इसमें हमारा क्या कसूर कि कंगना खुलाई से पहले इन्हें सोने के लिए हमारे मत्थे मढ़ दिया गया...। लात तो हमें इनको मारनी चाहिए थी जो इनकी वजह से हमारे पल्ले कल ये पड़े...। रात हमारी कोई कम खराब हुई का...?"

समीर का मन हुआ, एक सोंटी ले और सबको एक सिरे से खदेड़ आए। करना-धरना कुछ नहीं, उल्टे जो रात बची है, उसका भी सत्यानाश किए जा रहे हैं...।

"हमें नींद आ रही है...हम जा रहे सोने...। आप लोग अपनी बकवास चालू रखिए...।" नकली गुस्सा दिखाते वो वापस जाने लगा तो भाभी ने कस कर उसका हाथ पकड़ लिया,"ए ल्यो जी...कितना भोला है हमारा देवर...। आज सोने की बात कर रहा...तो ऐसा करो जी," वो भी बड़े भोलेपन से वापस भैया की ओर मुड़ी,"तुम आज की रात और लात खा लो...अपनी शर्मीली के पास आज हम सो जाते हैं...। नींद तो हमें भी बहुते ज़ोर से आ रही...।"

‘कहो तो गला टीप दें तुम्हारा...पर्मानेण्टली सो जाओ...अगर इतने बहुते ज़ोर की नींद लगी हो...।’ जी तो समीर का यही चाहा पर प्रकट में बस इतना ही बोला,"अब जैसी इजाज़त दो भाभी, वैसा ही करें...। तुम तो भैया के साथ ही हमें भी अपना ज़रखरीद ग़ुलाम बनाए हो...।"

इतने दिनो से समीर को देखती-समझती आ रही शान्ति समझ गई थी, उसकी खिजलाहट अपने चरम तक पहुँच चुकी थी। अभी उसे तंग करने से दिल तो नहीं भरा था, पर फिर पता नहीं क्या सोच के चुप लगा गई। सो अन्तिम वार करते हुए उसने समीर को कमरे में धकेल कर बाहर से कुंडी लगा दी,"जाओ लल्ला जी...आज की रात माफ़ किया तुम्हारी बेवफ़ाई को...। अपने दिल पर पत्थर रख कर सजाए हैं कमरा...और तुम्हारे मतलब का सारा सामान...दूध, पानी, तेल-फुलेल...सब वहीं रख दिया है...। अब हमें परेशान न करना...। ये दरवाज़ा तो अब तभी खुलेगा जब किला फ़तेह कर लोगे देवर जी...।"

हँसती-खिलखिलाती भाभियों के दूर जाने की आहट लगी तो समीर ने दरवाज़ा खींच कर देखा। ये शैतान की नानी शान्ति भाभी सच में बाहर से कुंडी लगा गई थी। सो उसने भी अन्दर से कुंडी चढ़ा ली...। क्या भरोसा, जब तक वो सैटिल हो, ये कमरे में ही आ धमकें...। दरवाज़े को फिर एक बार अच्छी तरह चेक कर उसने अब पलंग पर सिमटी-सकुचाई सी बैठी सुनयना की ओर देखा। उसके उलट वह रिसेप्शन में पहनी साड़ी बदल चुकी थी। उसके पसन्दीदा रंग...रॉयल ब्लू...की नेट की साड़ी में बहुत प्यारी लग रही थी। पूरा मखमली बदन जैसे झलका पड़ रहा था...। ये नेट की साड़ी उसके लिए किसने निकाली होगी, समीर अच्छी तरह समझ रहा था...। जय हो भाभी...।

उसे चुप खड़ा देख सुनयना ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखें उठा कर बस एक पल उसकी ओर देखा और फिर नज़रें झुका ली। तौबा, ये शर्मीलापन...जान न ले ले कहीं...। तभी तो आज जब अचानक ही दीपू भैया ने रिसेप्शन की पार्टी में एक गाना गाने के लिए उसका नाम एनाउंस कर दिया तो उसने वही गाना गाया, जो सुनयना पर बिल्कुल फिट बैठ रहा था...ओ मेरी...ओ मेरी...ओ मेरी शर्मीली...आओ न, तरसाओ न...। अभी भी देखो, कितना शर्मा रही है...। चेहरा लाल हुआ पड़ा है। तरस तो वह कब से रहा है, पर क्या करे...? कैसे शुरुआत करे...। कहीं पास जाने पर सुबह की तरह ‘दीऽऽऽदीऽऽऽ...’ करके चिल्ला दी तो रात के इस सन्नाटे में तो आवाज़ मोहल्ले के दूसरे कोने तक पहुँचेगी...और इस समय तो वो भाभी की बच्ची दरवाज़ा भी बन्द कर गई है, सुबह की तरह भाग भी नहीं पाएगा...।

सुबह की घटना अचानक फिर याद आ गई। एक तो कल जब से बारात विदा हो कर आई थी, उसे सुनयना के आसपास भी नहीं फटकने दे रही थी अम्मा...। एक बस वही राग...जब तक कंगना खुलाई नहीं हो जाती...दूर रह...। ख़बरदारऽऽऽ, जो बहू के आसपास भी नज़र आया...। रात को भी दीपू भैया के पास ही सुला दिया उसे...। आज सब रस्म हो जाने के बाद कितनी मुश्किल से सबसे बचता-बचाता सुनयना के पास आया भी तो बेआबरू होकर भागना पड़ा। अरे, उसने कहा ही क्या था जो ऐसा रियेक्शन मिला...? बस इतना ही तो पूछा था...आज किसके पास सो‍ओगी...? जवाब में सुनयना ने तार-सप्तक में बड़ी दीदी को पुकार लिया था। घबराहट में पलंग से कूद कर जो वो भागा तो सीधा घर के सामने वाले पार्क में ही जाकर रुका था, जहाँ शाम के रिसेप्शन की तैयारी हो रही थी। चप्पल भी वहीं रह गई थी, पलंग के पास...। दीपू भैया शायद सब समझ गए थे, तभी चेहरे की मुस्कान दबा बार-बार पूछ रहे थे,"आज ये नंगे पाँव काहे टहल रहे हो...कुछ चुभ-वुभ न जाए...।" वह भी चिढ़ा हुआ बिना जवाब दिए कुछ दूर हट कर काम देखने लगा था।

थोड़ी देर बाद से सुनयना का फोन आना शुरू हो गया था। गुस्से में वो बार-बार फोन काट रहा था। बड़ी आई...अब क्यों फोन कर रही...? उस समय तो ऐसा चिल्लाई जैसे वो कोई लफ़ंगा हो और जबरन उसके पास घुस आया हो...। पर फोन काटने की उसकी इस हरकत से सबका ध्यान उसकी ओर जाने लगा था, सो हार कर अगली कॉल ले ही ली थी,"क्या है...? क्यों डिस्टर्ब कर रही...? यहाँ बहुत काम है, करूँ कि नहीं...?"

जवाब में सुनयना की रुआँसी आवाज़ आई थी,"एक बार यहाँ आइए न...बहुत ज़रूरी काम है...।"

"कोई भी काम हो...दीदी को बुला लो...।" उसकी आवाज़ से तल्ख़ी गई नहीं थी।

"नहीं...जो काम है, आप ही कर सकते हैं...। हम किसी और से नहीं कह सकते...।"

उसका दिल बल्लियों उछल गया। ऐसा काम जो सिर्फ़ वही कर सकता है...मतलब आग बराबर की लगी थी शायद...। फिर तो वो उछलता-कूदता वापस भागा था। भैया आवाज़ देते ही रह गए थे...अरे बंटी...ये हलवाई क्या मंगा रहा है...। सुन तो ले...। पर वो तो ये गया, वो गया...। दिल दा मामला है दिलबर...।

कमरे में पहुँचा तो सुनयना हाथ में एक पैकेट पकड़े बैठी थी। उसे देखते ही खिल गई,"अच्छा हुआ आप आ गए...। जरा देखिए न...हमारे टेलर ने क्या गड़बड़ कर दिया...। हमको आज शाम को रिसेप्शन में जो साड़ी पहननी है न, उसके ब्लाउज में हुक लगाया ही नहीं...। हम भी चेक नहीं किए थे, बस पैक कर लिए। अब रात में पहनेंगे क्या...?"

उसका दिल बुझ गया। तो इस काम के लिए बुलाया है..."इसमें हम क्या करें...? कोई भी दूसरी साड़ी पहन लो...। न हो तो अम्मा या दीदी की ले लो...। हम कोई टेलर तो हैं नहीं जो ब्लाउज में हुक लगा दें...।"

"नहीं, आप समझे नहीं...। आप को लगाने को थोड़े न कह रहे...आप किसी टेलर के यहाँ से लगवा लाएँगे...प्लीज़...।" सुनयना ने इतने कातर स्वर में कहा कि वो एकदम पिघल गया...। बेचारी, अभी कल ही तो आई है...अभी अगर वो ही नाराज़गी जताएगा तो किससे कहेगी कुछ...। यही सोच कर उसने उसके हाथ से ब्लाउज ले लिया,"ठीक है, लगवा लाते हैं किसी से...। पर थोड़ा दूर जा रहे, यहाँ मोहल्ले वाले से थोड़े न लगवाएँगे...मज़ाक उड़वाने के लिए...। और हाँ, कोई पूछे तो पकर-पकर कह न देना कि हमारे ब्लाउज का हुक लगवाने गए हैं...।"

सुनयना ने मुस्करा कर ‘हाँ’ में गर्दन हिला दी तो जाने क्यों उसका गुस्सा काफ़ूर हो गया...। हाय रे...! ये क़ातिल अदा...क़त्ल करते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं...। एक थैली में ब्लाउज छिपा कर सबकी पुकार के उत्तर में...बस्स अभी आते हैं...कहता वो तेज़ी से बाइक स्टार्ट कर निकल गया...। उसकी जानकारी का अगला टेलर यही कोई सात-आठ किलोमीटर की दूरी पर था...जहाँ से एक-आध बार वो अम्मा या भाभी का कोई कपड़ा लेकर आया था।

शाम को पार्टी में तो वो सबसे काफ़ी घुली-मिली सी लग रही थी। जब गाने के लिए उसने मना किया तब धीरे से उससे भी तो बोली थी...गा दीजिए न...सब कह रहे थे आप बहुत अच्छा गाते हैं...। हमारा भी मन है आपको गाते सुनने का...। उसका मन बाग-बाग हो गया था...। जानू, ये हुई न बात...।

अचानक वो फिर वर्तमान में आ गया...। हाँ, यही ठीक है...पहले थोड़ी बात करता है...। जब खुल जाएगी तब भाभी की भाषा में किला फ़तेह करने की ओर पहल करेगा...।

पलंग की ओर बढ़ते अपने कदमों को रोक वो वहीं ड्रेसिंग टेबल पर बैठ गया। हाथ से घड़ी उतार कर उसी पर रख दी...। ए.सी चलने के बावजूद न जाने क्यों गर्मी लग रही थी। मन हुआ शेरवानी भी उतार दे, पर रुक गया...।

"खाना ठीक से खाया था न...?"

सुनयना ने उसी तरह गर्दन नीचे किए हुए ‘हाँ’ कह दिया।

"पैसा कब दोगी...?" जितनी सहजता से उसने अगला सवाल पूछा, उतना ही सुनयना चौंक गई,"पैसा...कैसा पैसा...?"

"अरे...इतनी दूर गए तुम्हारा काम करवाने...पेट्रोल खर्च हुआ और अर्जेन्ट करने पर दर्ज़ी ने भी तो डबल चार्ज किया...। वो कौन देगा...?"

सुनयना इतनी ज़ोर से हँसी कि वो भी खिलखिलाए बिना नहीं रह सका। एक झटके में जैसे सारी दीवार गिर गई हो। अब आराम से शेरवानी उतारी जा सकती है...। उसके मन में कई शरारती तस्वीरें घूम गई जो दोस्तों और दीपू भैया की कृपा से कब से उसके दिमाग में उथल-पुथल मचाए हुए थी।

"बत्ती बुझा दूँ...?"

जवाब में सुनयना ने फिर नज़रें झुका ली। गर्दन हिला धीमे से...जैसी आपकी मर्ज़ी...ही कह पाई...। बल्ले-बल्ले...उसका मन हुआ सुबह जितनी तेज़ी से बाहर भागा था, इस समय उससे भी दुगुनी तेज़ी से भाग कर वापस पलंग पर कूद जाए। पर बत्ती बुझा कर पलंग की ओर जाते उसके पाँव सहसा ही थम गए थे।

बाहर बरामदे में जल रही लाइट की एक पतली-सी लकीर दरवाज़े को चीरती सीधे पलंग पर पड़ रही थी। उसने पलट कर देखा तो जैसे जड़ रह गया। दरवाज़े के एक पल्ले में बरसों पहले छिदी वह झिरी सहसा उसे मुँह चिढ़ाती-सी लगी। इसे कैसे भूल गया वो...? अब...अब क्या करे...?

***